चित्रकूट जेल शूट आउटः मजहबी एंगल तो नहीं!

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    गाजीपुर (सुजीत सिंह प्रिंस)। चित्रकूट जेल शूट आउट की असल और पूरी कहानी सामने आने की बेसब्री गाजीपु के करीमुद्दीनपुर थाने के महेंद गांव के लोगों को भी है। उस शूट आउट में मारा गया मेराज खां इसी गांव का मूल बाशिंदा जो था। हालांकि असल कहानी जांच के बाद ही सामने आएगी लेकिन अंडरवर्ल्ड में इसमें मजहबी एंगल पर भी चर्चा हो रही है।

    यह चर्चा करने वाले अपनी बात को पुख्ता बनाने के लिए तर्क भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में मेराज संग मारा गया पश्चिमी यूपी का खूंखार गैंगस्टर मुकीम काला था। उसके मजहबी तंजों से ही आजिज आकर पूर्वांचल के कुख्यात गैंगस्टर अंशुल दीक्षित ने ऐन ईद त्यौहार के दिन 14 मई को ही जेल की बैरक में मुकीम काला और मेराज खां को ढेर किया। मुकीम के शरीर में उसने एक-दो नहीं बल्कि पूरी 13 गोलियां उतार दी थी। मुकीम अपने मजहब को लेकर बिल्कुल कट्टर था। उसकी कट्टरता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि प्रदेश की पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार के काल में साल 2012 से 2017 के बीच शामली जिले के कैराना से हिंदुओं के पलायन का वह मुख्य आरोपित था। उसने ऐसा टेरर बनाया था कि कैराना के हिंदू अपना घरबार छोड़ कर कहीं अन्यत्र जाने को मजबूर हो गए थे। तब भाजपा के अलावा हिंदूवादी संगठनों ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था। ऐसे में हैरानी नहीं कि मुंहफट मुकीम काला जेल की बैरक में मजहबी तंज कसने से बाज न आता हो और उसकी बातें आखिर में जिद्दी, हथछूट गैंगस्टर अंशुल के दिल को हर्ट कर गई हों।

    …तब मेराज खां को अंशुल ने क्यों मारा जबकि मेराज फिरकापस्त नहीं था। अंडरवर्ल्ड में जितना हममजहबी माफियांओं से उसके गहरे ताल्लुकात थे, उतने ही गैरमजहबी डॉन भी उसके करीबी थे। इस सवाल पर पूरे घटनाक्रम में मजहबी एंगल तलाशने वाले अंडरबर्ल्ड के लोगों का कहना है कि इसमें मेराज की मुकीम काला से बैरक की संगत कारण हो। वैसे अंडरवर्ल्ड के कुछ माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी के साल 2018 में बागपत जेल में हुए कत्ल के बदले की भावना से भी जोड़ रहे हैं। अंशुल मुन्ना बजरंगी के लिए काम कर चुका था जबकि मुन्ना बजरंगी के कत्ल से पहले ही मेराज खां अपने को उससे दूर कर लिया था और बड़बोला मेराज खुद को उस कत्ल की साजिश का हिस्सेदार भी बताने लगा था। उस सिलसिले में मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर मे मेराज भी नामजद किया गया था।

    अंडरवर्ल्ड के लोगों का कहना है कि मुकीम काला और मेराज खां को मारने के लिए अंशुल दीक्षित को चित्रकूट जेल की हाई सिक्योरिटी बैरक में मुंगेर (बिहार) में बनी नाइन एमएम पिस्तौल कब और कैसे पहुंची थी। इसका सही जवाब भी जांच के बाद ही मिलेगा लेकिन यह तय है कि अंशुल जेल की सिक्योरिटी सिस्टम की खामियों से वाकिफ था और उसे यह भी पता था कि जेल में आपत्तिजनक वस्तुएं कैसे उपलब्ध होती हैं। रायबरेली जेल में रहते उसकी दारू पार्टी की वायरल हुई वीडियो क्लिप इस बात की गवाह है। उसके बाद ही अंशुल को रायबरेली से चित्रकूट की जेल में शिफ्ट किया गया था। मुकीम काला और मेराज की हत्या के कुछ ही देर बाद खुद अंशुल भी पुलिस मुठभेड़ में ढेर हो गया था।

    अपने हाथों एक चिड़िया भी नहीं मारा था मेराज

    मेराज के पैतृक गांव महेंद के लोगों की मानी जाए तो वह अपने हाथों शायद ही कभी कोई चिड़िया भी मारा हो। अलबत्ता, अंडरवर्ल्ड में उसकी पहचान एक भरोसेमंद फाइनेंसर, प्रोटेक्टर और इनफॉर्मर की जरूर थी। वह हममजहबी माफिया डॉनों में सबसे ज्यादा करीबी अतीक अहमद का था। मेराज का शव चित्रकूट से लाकर महेंद गांव में ही उसके पुश्तैनी कब्रिस्तान में ही दफनाया गया।

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